आज मै जीत गया, ज्ञान मुझमे समा गया।
देखते ही देखते, चार युगो मे पहुंच गया।
आज मै भी तो ऊपरवाला. बन गया।
मेरे भीतर चार वेद ही बस गया।
नही पढना मुझको रामायण।
नही जानना मुझको महाभारत।
क्या कहती ,गीता नही सुनना।
और वेद पुराणो की बाते ना कहना।
आज बस मै हू, और एक मै.हू।
आत्मा के भीतर ऐक ज्योति हूं।
अंतरमन से देखा तो पाया।
व्यर्थ ह्रदय को मैने तरसाया।
छोटा सा ज्ञान था, एक विज्ञान था।
कही नहीगया मै, केवल उलझा था।
जब से किया है प्रेम मय जीवन।
तब से लिया दया, करणा का भाव मन।
फिर ये तन कभी नही अकुलाया।
सब मे मै था, मुझी मे सब.थे।
बस हरियाली, और प्रकृति
के सानिध्य मे मन रमा था।
जब तक रहना रह.कर जाना।
फिर क्यो चिंता जब सबको तज आना।
आज तक यू ही भटक रहा था।
किसी वन मे जैसे अटक रहा था।
आज सब दूर हुई, मेरी व्यथा तो।
आज कथा सार बनी, यह समझ आया।